कोरबा। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि बुधवार को कोरबा सहित आसपास के क्षेत्रों में हलषष्ठी (खमरछठ/कमरछठ) का पर्व श्रद्धा, आस्था और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। माताओं ने अपनी संतान की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और उज्ज्वल भविष्य की कामना को लेकर दिनभर निर्जला व्रत रखा। शाम को विधि-विधान से सगरी की पूजा-अर्चना कर भगवान बलराम और हलषष्ठी माता से संतान की रक्षा एवं मंगल की प्रार्थना की गई।
पौराणिक मान्यता के अनुसार हलषष्ठी तिथि भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई भगवान बलराम जी के अवतरण दिवस के रूप में भी मानी जाती है। भगवान बलराम का प्रमुख आयुध हल है और इसी कारण इस पर्व का नाम हलषष्ठी पड़ा। लोकमान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत एवं पूजन करने वाली माताओं को संतान के दीर्घायु और सुखी जीवन का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
सगरी बनाकर की भगवान बलराम और हलषष्ठी माता की पूजा
छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति में खमरछठ का विशेष धार्मिक एवं पारंपरिक महत्व है। पर्व के अवसर पर माताओं ने घर के आंगन, चौपाल अथवा पूजा स्थल पर मिट्टी से सगरी यानी छोटे कृत्रिम तालाब का निर्माण किया। सगरी में जल भरकर बेर की शाखा, कांस, पलाश और छिंद की झाड़ियों को स्थापित किया गया। इसके बाद भगवान बलराम जी एवं हलषष्ठी माता का विधि-विधान से पूजन किया गया।
पूजन के दौरान माताओं ने संतान की दीर्घायु और परिवार की सुख-शांति के लिए खमरछठ की कथा सुनी। पर्व की पूजा में छह अंक का विशेष महत्व रहा। सगरी में छह बार जल अर्पित करने के साथ छह प्रकार की भाजियां, छह खिलौने और छह लाई के दोने चढ़ाए गए। महुआ के फल-फूल-पत्ते, ज्वार की धानी, भुना चना, सात प्रकार के अनाज तथा मिट्टी से बने खिलौने भी पूजा सामग्री में शामिल रहे।

हल से जुती भूमि के अन्न का नहीं किया सेवन
खमरछठ के व्रत की एक प्रमुख विशेषता यह रही कि माताओं ने ऐसी खाद्य सामग्री का ही सेवन किया, जिसके उत्पादन में हल का उपयोग नहीं हुआ हो। पूजन के बाद पसहर (तिन्नी) चावल का भात और छह प्रकार की भाजियों का प्रसाद ग्रहण किया गया। महुआ तथा भैंस के दूध से तैयार दही का भी विशेष महत्व रहा।
धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान बलराम का प्रमुख शस्त्र हल होने के कारण हलषष्ठी के दिन हल से जुती भूमि में पैदा हुए अनाज का सेवन नहीं किया जाता। यह परंपरा कृषि संस्कृति, प्रकृति और भगवान बलराम के प्रति श्रद्धा का प्रतीक मानी जाती है।
बच्चों की पीठ पर पोती लगाकर दिया आशीर्वाद
पूजन के बाद माताओं ने अपने बच्चों की पीठ पर हल्दी और कपड़े से बनी पोती लगाई तथा उनकी लंबी आयु और निरोगी जीवन की कामना करते हुए आशीर्वाद दिया। शाम को कथा एवं पूजन संपन्न होने के बाद पारंपरिक विधि से व्रत का पारण किया गया।
बाजारों में दिखी पर्व की रौनक
खमरछठ को लेकर शहर और आसपास के क्षेत्रों में पिछले कई दिनों से चौक-चौराहों एवं साप्ताहिक बाजारों में पूजा सामग्री की दुकानें सजी हुई थीं। बुधवार सुबह से ही माताओं द्वारा पूजा सामग्री, महुआ, लाई, धानी, मिट्टी के खिलौने और अन्य आवश्यक सामग्री की खरीदारी की गई। विभिन्न मोहल्लों में सगरी निर्माण और सामूहिक पूजा-अर्चना का दृश्य देखने को मिला।
खमरछठ का पर्व जहां मां और संतान के अटूट स्नेह का प्रतीक है, वहीं यह छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकपरंपरा, कृषि संस्कृति और पौराणिक आस्था को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखने का माध्यम भी बना हुआ है।



