रायपुर। यूसीसी के नाम पर ‘सर्वसमावेशी सुझाव और सर्वे’ के दावों को केवल आईवॉश (दिखावा) बताते हुए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा है कि सरकारी दावें की हकीकत यह है कि बंद कमरों में एक अधिनायकवादी सरकार का ड्राफ्ट पहले से तैयार है, जिसे छत्तीसगढ़ की सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता पर जबरन थोपने की तैयारी है। छत्तीसगढ़ की देवतुल्य जनता को गुमराह करने के लिए भाजपा सरकार यूसीसी के नाम पर जो सुझाव और सर्वे का नाटक रच रही है, वह पूरी तरह से फर्जी और पूर्व-नियोजित है। असली ड्राफ्ट दिल्ली के बंद कमरों में पहले ही लिखा जा चुका है, जिसमें छत्तीसगढ़ के आदिवासियों, दलितों और पिछड़ों की राय के लिए कोई स्थान नहीं है। यह छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक स्वायत्तता, मान्य प्रथा, परंपरा और रूढ़िगत अधिकारों पर एक सुनियोजित डाका है, जिसे प्रदेश कांग्रेस कमेटी किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेगी।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा है कि छत्तीसगढ़ की लगभग आधी आबादी पिछड़ों की है और लगभग 32 प्रतिशत से अधिक आबादी आदिवासी है। इसके अलावा बड़ी संख्या में अनुसूचित जाति के लोग हैं जिनकी अपनी पारंपरिक, सामाजिक व सांस्कृतिक व्यवस्थाएँ (Customary Laws) हैं। यूसीसी लागू होने से आदिवासी, अनुसूचित जाति और ओबीसी के रूढ़िगत अधिकार प्रभावित होंगे अनुसूची 5 और 6, पेसा (PESA) कानून और जल-जंगल-जमीन पर समुदाय के पारंपरिक अधिकार सीधे प्रभावित होंगे। विवाह, गोद लेने और संपत्ति के अधिकार प्रभावित होंगे। रूढ़िगत परंपराओं के हनन से सामाजिक ताना-बाना टूटेगा। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने ‘छत्तीसगढ़िया स्वाभिमान’, जनजातीय संस्कृति, देवगुड़ी संरक्षण और स्थानीय परंपराओं को संवर्धित किया था, जबकि भाजपा सरकार दिल्ली के इशारे पर छत्तीसगढ़ी संस्कृति और अधिकारों को कुचलने का काम कर रही है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा है कि यूसीसी सर्वे एक ढोंग है, ड्राफ्ट पहले से ही दिल्ली में तैयार है। भाजपा सरकार का यह सर्वे जनता की राय लेने के लिए नहीं, बल्कि अपने नागपुरी/दिल्ली के एजेंडे पर मुहर लगाने का एक प्रायोजित नाटक है। छत्तीसगढ़ी स्वाभिमान व जल-जंगल-जमीन के अधिकार यह सरकार छिनना चाहती है। यह आदिवासी और मूल निवासियों की अस्मिता पर सीधा हमला है। छत्तीसगढ़ की विशिष्ट पहचान, पारंपरिक अधिकारों और पेसा (PESA) कानून को खत्म करने की साजिश किया जा रहा है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा है कि समानता के नाम पर छत्तसगढ़िया संस्कृति और आदिवासियों की पारंपरिक व्यवस्था, अनुसूची 5 के तहत जल-जंगल- जमीन के अधिकारों को खत्म करना चाहती है यह सरकार। जब ड्राफ्ट पहले से तय है, तो इस फर्जी सर्वे और प्रक्रिया पर छत्तीसगढ़ की जनता के करोड़ों रुपये क्यों लुटाए जा रहे हैं? क्या राज्य सरकार यह लिखित गारंटी देगी कि छत्तीसगढ़ के रूढ़िगत अधिकार, प्रथा परंपरा पर हस्तक्षेप नहीं होगा? क्या भाजपा के आदिवासी विधायक और मंत्री अपने समाज के पारंपरिक अधिकारों की बलि देकर दिल्ली के आकाओं के सामने नतमस्तक हो चुके हैं? नागपुर और दिल्ली के एजेंडे को थोपने के लिए छत्तीसगढ़ की समृद्ध और विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को बलि का बकरा क्यों बनाया जा रहा है? यूसीसी का मतलब ‘यूनिफॉर्म सिविल कोड’ नहीं, भाजपा के लिए इसका मतलब ‘अधिनायकवादी थोपा हुआ कोड’ है। फर्जी सर्वे, सुझाव का नाटक बंद कर प्रभावितों से सीधे बात करे और बताए कि स्थानीय मूल निवासियों के अधिकारों को छीना जा रहा है या नहीं?



