रायपुर। छत्तीसगढ़ के शत-प्रतिशत अनुदान प्राप्त अशासकीय महाविद्यालयों के सेवानिवृत्त शिक्षकों और कर्मचारियों को शासन के एक फैसले से बड़ा झटका लगा है। उच्च शिक्षा विभाग ने वर्ष 2010 में जारी उस आदेश को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया है, जिसके आधार पर इन महाविद्यालयों के पेंशनरों को पांचवें वेतनमान के आधार पर पेंशन और ग्रेच्युटी तथा चौथे वेतनमान के आधार पर ग्रेच्युटी का लाभ मिल रहा था। शासन के इस निर्णय के बाद पेंशनरों को मिलने वाले इन लाभों को लेकर संकट खड़ा हो गया है।
मंत्रिपरिषद के निर्णय के बाद कार्रवाई
उच्च शिक्षा विभाग के अनुसार 22 जुलाई 2026 को हुई मंत्रिपरिषद की बैठक में इस मामले पर विचार किया गया था। बैठक में नियमों में आवश्यक प्रावधान नहीं होने और प्रस्ताव को लोकहित में उचित नहीं पाए जाने के आधार पर इसे अमान्य करने का निर्णय लिया गया। साथ ही, उच्चतम न्यायालय, नई दिल्ली में लंबित संबंधित प्रकरणों में शासन की ओर से प्रभावी विधिक पैरवी करने का परामर्श भी दिया गया।
मंत्रिपरिषद के निर्णय के बाद उच्च शिक्षा विभाग ने एक सितंबर 2026 को आदेश जारी कर 12 अक्टूबर 2010 के पुराने विभागीय आदेश को निरस्त कर दिया। इस आदेश के खत्म होने के साथ ही उसके आधार पर दिए जा रहे पेंशन और ग्रेच्युटी संबंधी लाभ भी प्रभावित हुए हैं।
350 लाख की दूसरी किश्त का आदेश भी निरस्त
शासन के फैसले का असर पेंशन भुगतान के लिए स्वीकृत राशि पर भी पड़ा है। उच्च शिक्षा विभाग ने 8 सितंबर 2026 को अशासकीय महाविद्यालयों के पेंशनरों के लिए 1400 लाख रुपए के प्रावधान में से दूसरी किश्त के रूप में 350 लाख रुपए जारी करने की स्वीकृति दी थी। अब इस आदेश को भी निरस्त कर दिया गया है।
विभाग ने स्पष्ट किया है कि मंत्रिपरिषद के निर्णय और 1 सितंबर 2026 को जारी आदेश के अनुक्रम में 8 सितंबर को जारी 350 लाख रुपए की दूसरी किश्त संबंधी विमुक्ति आदेश भी निरस्त माना जाएगा। यानी स्वीकृत राशि की यह दूसरी किश्त अब जारी नहीं होगी।
40 साल पुरानी व्यवस्था पर उठे सवाल
शासन के इस फैसले को लेकर छत्तीसगढ़ राज्य अनुदान प्राप्त महाविद्यालयीन प्राध्यापक संघ ने कड़ा विरोध जताया है। संघ के प्रांतीय अध्यक्ष डॉ. अजय कुमार शर्मा ने निर्णय को आश्चर्यजनक बताते हुए कहा कि करीब 40 वर्षों से चली आ रही व्यवस्था को अचानक समाप्त किए जाने से सेवानिवृत्त शिक्षक गंभीर आर्थिक संकट में आ जाएंगे।
संघ का कहना है कि बड़ी संख्या में ऐसे बुजुर्ग शिक्षक हैं, जिनकी उम्र 90 वर्ष से अधिक है। उनके लिए पेंशन केवल आय का साधन नहीं, बल्कि रोजमर्रा के खर्च और इलाज का प्रमुख सहारा है। ऐसे में पेंशन और ग्रेच्युटी से जुड़े लाभों पर रोक लगने से वृद्ध पेंशनरों के सामने आर्थिक और चिकित्सा संबंधी परेशानियां बढ़ सकती हैं।
सेवारत शिक्षकों में भी चिंता
प्राध्यापक संघ ने कहा है कि इस फैसले का असर केवल सेवानिवृत्त शिक्षकों तक सीमित नहीं रहेगा। सेवारत शिक्षकों में भी भविष्य की पेंशन व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ी है। संघ का तर्क है कि लंबे समय से चली आ रही व्यवस्था में अचानक बदलाव से कर्मचारियों के भविष्य की आर्थिक सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
संघ ने शासन से पूरे मामले पर पुनर्विचार करने और पेंशनरों के हितों को ध्यान में रखते हुए उचित निर्णय लेने की मांग की है।



