वी. पी. तिवारी. एमसीबी। जिले का कोयलांचल नगरी चिरमिरी एक बार फिर से सुर्ख़ियों के केंद्र में है। यहां की बंद पड़ी अंजनहिल और बरतुंगा खदानों को फिर से चालू करने की सुगबुगाहट अब तेज हो गई है। लेकिन इस बार कोयला निकालने का तरीका पुराना नहीं होगा, बल्कि इसे ‘ओपन कास्ट’ तकनीक से संचालित करने की बड़ी योजना तैयार की जा रही है।

गौरतलब है कि वर्ष 2010 में हुए एक बेहद दर्दनाक हादसे के बाद इन भूमिगत खदानों ने खामोशी ओढ़ ली थी और इनका संचालन पूरी तरह से रोक दिया गया था। अब लगभग डेढ़ दशक बाद एसईसीएल और निजी कंपनियों के गठजोड़ से ये खदानें फिर से धड़कने को तैयार हैं। एक तरफ जहां इस परियोजना के जरिए विकास का दावा किया जा रहा है और रोजगार के नए सपने दिखाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ इन सबके बीच पर्यावरण, जंगल, पहाड़ और स्थानीय लोगों की आजीविका पर मंडराते गंभीर संकट ने एक बड़ी और तीखी बहस को जन्म दे दिया है।
388 हेक्टेयर का ‘ऑपरेशन’, 211 हेक्टेयर जंगल पर सीधा खतरा
इस प्रस्तावित मेगा माइनिंग प्रोजेक्ट का दायरा कोई छोटा-मोटा नहीं है। जानकारी के अनुसार, करीब 388 हेक्टेयर के विशाल क्षेत्र में यह ओपन कास्ट खदान फैलेगी। लेकिन स्थानीय लोगों और पर्यावरणविदों के लिए चिंता की सबसे बड़ी लकीर यह है कि इस पूरी परियोजना में 211 हेक्टेयर से अधिक की बेशकीमती वन भूमि भी शामिल है। यह चिरमिरी का वह इलाका है जहां सदियों पुराने, घने पेड़ और एक बेहद समृद्ध जैव विविधता (Bio-diversity) बसती है।

ओपन कास्ट माइनिंग का सीधा और खौफनाक मतलब होता है – प्राकृतिक पहाड़ों का सीना चीरना, ऊपरी सतह की मिट्टी और चट्टानों को पूरी तरह से उधेड़ना और फिर गहरी खाइयों से कोयला निकालना। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब सैकड़ों हेक्टेयर में फैले इन हरे-भरे जंगलों पर भारी-भरकम बुलडोजर और मशीनें चलेंगी, तो चिरमिरी के इस खूबसूरत प्राकृतिक आवरण का क्या होगा?
क्या हमेशा के लिए बदल जाएगा पहाड़ों का भूगोल?
अंजन हिल और बरतुंगा हिल सिर्फ कोयले की खदानें नहीं हैं, बल्कि ये चिरमिरी की प्राकृतिक पहचान और धरोहर का अहम हिस्सा हैं। ओपन कास्ट खनन में सतह पर मौजूद हर चीज को पूरी तरह से नष्ट कर दिया जाता है। ऐसे में यह प्रबल आशंका जताई जा रही है कि इन पहाड़ियों का मूल स्वरूप हमेशा-हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से सिर्फ जंगल ही नहीं उजड़ेंगे, बल्कि आसपास बसे गांवों के तापमान, मौसम चक्र और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) पर इसका बहुत ही व्यापक और दीर्घकालिक नकारात्मक असर पड़ना तय माना जा रहा है। पहाड़ कटने से क्षेत्र में भूस्खलन और मिट्टी के कटाव का खतरा भी कई गुना बढ़ जाएगा।
धूल, धुआं और प्यास
ग्रामीणों की रातों की नींद उड़ी प्रशासन और कंपनियों के विकास के दावों के बीच सबसे ज्यादा खौफजदा वो आम ग्रामीण हैं, जिनकी रोजमर्रा की जिंदगी इन जंगलों और पहाड़ों से गहराई से जुड़ी हुई है। ओपन कास्ट माइनिंग अपने साथ भारी वाहनों का बेतहाशा शोर, हवा में 24 घंटे तैरती जानलेवा काली धूल और जलस्रोतों का अभूतपूर्व संकट लेकर आती है। ग्रामीणों को इस बात का गहरा डर है कि भारी मशीनों के चलने और लगातार होने वाली ब्लास्टिंग से उनका भूजल स्तर पाताल में चला जाएगा। हवा इतनी अधिक प्रदूषित हो जाएगी कि खुली हवा में सांस लेना मुहाल हो जाएगा। इसके अलावा पीने के पानी के जो प्राकृतिक स्रोत हैं, वे या तो पूरी तरह से सूख जाएंगे या फिर कोयले की धूल और रसायनों से जहरीले हो जाएंगे।
विकास और रोजगार बनाम पर्यावरण का विनाश
इस पूरे मामले में हर सिक्के के दो पहलुओं की तरह दो अलग-अलग राय सामने आ रही है। इस प्रोजेक्ट के समर्थक रोजगार के नए अवसरों के सृजन, बढ़ती आर्थिक गतिविधियों और पूरे क्षेत्र के तेज विकास की दलील दे रहे हैं। उनका तर्क है कि खनन गतिविधियां शुरू होने से युवाओं को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलेगा। प्रशासन की तरफ से राहत की एक बात यह भी बताई जा रही है कि इस परियोजना में किसी भी निजी भूमि के अधिग्रहण की आवश्यकता नहीं होगी। लेकिन दूसरी तरफ सवाल यह है कि क्या महज आर्थिक मुनाफे और चंद रोजगारों के लिए पर्यावरण की इतनी बड़ी कीमत चुकाना जायज है? यह सवाल आज हर उस शख्स के जेहन में कौंध रहा है, जो चिरमिरी के आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य की फिक्र करता है।
पारदर्शिता की मांग
चिरमिरी का पूरा अस्तित्व कोयले की खदानों और प्रकृति, दोनों के एक नाजुक संतुलन पर टिका हुआ है। स्थानीय जनता, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरण प्रेमियों की अब एक ही प्रमुख मांग है – पूरी पारदर्शिता बरती जाए। वे यह स्पष्ट रूप से जानना चाहते हैं कि इस महाविनाश से पर्यावरण को बचाने का असल प्लान क्या है? पेड़ों की कटाई के बदले पुनर्वनीकरण (Afforestation) की क्या कोई ठोस और जमीनी योजना है? प्रदूषण से निपटने और आसपास रहने वाले ग्रामीणों की स्वास्थ्य सुरक्षा के क्या उपाय किए जाएंगे, इन सभी बातों को अविलंब सार्वजनिक किया जाए। आगामी जनसुनवाई से पहले पर्यावरण संरक्षण के सारे सरकारी दावों और जमीनी हकीकत पर खुलकर और पारदर्शी चर्चा होनी चाहिए।



