जांजगीर-चांपा। संघर्षों से जूझते हुए आगे बढ़ना और अपनी सफलता को समाज सेवा का माध्यम बना देना आसान नहीं होता। छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के ग्राम भैंसमुड़ी निवासी तथा सेवा इंटरनेशनल फेलो सुखनंदन दास की जीवन यात्रा ऐसी ही प्रेरक कहानी है, जिसमें अभाव, संघर्ष, शिक्षा, सेवा और सामाजिक बदलाव का अनूठा संगम देखने को मिलता है। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया, बल्कि इन्हीं चुनौतियों को अपनी ताकत बनाकर समाज के जरूरतमंद वर्गों के लिए काम करने का संकल्प लिया।
बचपन में सिर से उठा माता-पिता का साया
सुखनंदन दास का बचपन कठिन परिस्थितियों में बीता। जब वे कक्षा सातवीं में पढ़ रहे थे, तभी उनकी माता का निधन हो गया। कुछ वर्षों बाद पिता भी चल बसे। कम उम्र में ही परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद उन्होंने पढ़ाई छोड़ने के बजाय संघर्ष के साथ आगे बढ़ने का फैसला किया।

परिवार के पालन-पोषण और अपनी शिक्षा जारी रखने के लिए वे प्रतिदिन करीब 25 किलोमीटर साइकिल चलाकर मजदूरी करने जाते थे। उस समय उन्हें लगभग 70 रुपये प्रतिदिन मजदूरी मिलती थी। इसी सीमित आय से वे परिवार की जरूरतों के साथ अपनी पढ़ाई का खर्च भी पूरा करते रहे। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपने सपनों को कभी मरने नहीं दिया।
शिक्षा को बनाया बदलाव का माध्यम
सुखनंदन का मानना रहा कि शिक्षा व्यक्ति के जीवन को बदलने के साथ-साथ पूरे समाज को बदलने की क्षमता रखती है। इसी सोच के साथ उन्होंने लगातार अध्ययन जारी रखा और बी.कॉम., पीजीडीसीए, मास्टर ऑफ सोशल वर्क तथा पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन रूरल डेवलपमेंट जैसी शैक्षणिक योग्यताएं हासिल कीं।
शिक्षा के दौरान ही उनके भीतर समाज के कमजोर और जरूरतमंद वर्गों के लिए कुछ करने की भावना और मजबूत होती गई। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियों को केवल स्वयं तक सीमित रखने के बजाय उन्हें सामाजिक बदलाव का माध्यम बनाने का निर्णय लिया।
गांव के बच्चों से शुरू हुआ सेवा का सफर
युवावस्था में ही सुखनंदन ने सामाजिक कार्यों में सक्रिय भागीदारी शुरू कर दी। उन्होंने अपने गांव में बच्चों के लिए छोटे स्तर पर कोचिंग एवं संस्कार केंद्र की शुरुआत की। यहां आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को शिक्षा के साथ नैतिक मूल्यों और संस्कारों की जानकारी दी जाती थी।

राष्ट्रीय सेवा योजना से जुड़कर उन्होंने स्वच्छता, स्वास्थ्य, शिक्षा और जनजागरूकता से जुड़े विभिन्न अभियानों में भी सक्रिय भूमिका निभाई। धीरे-धीरे उनका सामाजिक कार्य गांव से निकलकर व्यापक समुदाय तक पहुंचने लगा।
कोरोना काल में बढ़ाया मदद का हाथ
कोविड-19 महामारी के दौरान जब पूरा देश संकट से जूझ रहा था, तब सुखनंदन दास ने जरूरतमंद परिवारों की मदद के लिए आगे बढ़कर काम किया। उन्होंने जरूरतमंदों तक खाद्य सामग्री पहुंचाने, स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता फैलाने और समुदाय के लोगों को आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराने में योगदान दिया।
महामारी के कठिन दौर में उनकी सेवा भावना ने लोगों के बीच भरोसा और उम्मीद पैदा करने का काम किया।
सेवा इंटरनेशनल फेलोशिप से मिली नई दिशा
समाज सेवा के प्रति उनके निरंतर समर्पण को नई दिशा तब मिली, जब वे सेवा इंटरनेशनल फेलोशिप से जुड़े। फेलोशिप के माध्यम से उन्हें नेतृत्व, सामाजिक नवाचार और सामुदायिक विकास के क्षेत्र में सीखने और काम करने का अवसर मिला।
इस अनुभव ने उनके सामाजिक कार्यों को अधिक व्यवस्थित और प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने स्थानीय स्तर की समस्याओं को समझते हुए शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और युवा विकास को अपने कार्यों का प्रमुख केंद्र बनाया।
माता-पिता की स्मृति में बनाई जनकल्याण समिति
अपने दिवंगत माता-पिता की स्मृति को समाज सेवा के माध्यम से जीवित रखने के उद्देश्य से सुखनंदन दास ने ‘मां बाबूजी जनकल्याण समिति, छत्तीसगढ़’ की स्थापना की। संस्था के माध्यम से शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, युवा विकास और सामुदायिक नेतृत्व निर्माण के क्षेत्र में विभिन्न गतिविधियां संचालित की जा रही हैं।
संस्था की प्रमुख पहल ‘मां बाबूजी संस्कार केंद्र’ है, जिसके माध्यम से ग्रामीण और वंचित समुदायों के बच्चों को शिक्षा, व्यक्तित्व विकास, नैतिक मूल्यों और संस्कार आधारित शिक्षण उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है।
महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने पर जोर
महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में संस्था स्वयं सहायता समूहों को प्रोत्साहित कर रही है। महिलाओं को सिलाई, कढ़ाई, हस्तशिल्प और अन्य स्वरोजगार आधारित गतिविधियों का प्रशिक्षण देकर उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम किया जा रहा है।
वहीं युवाओं के लिए नशामुक्ति जागरूकता, करियर मार्गदर्शन, नेतृत्व विकास, प्रेरणा शिविर, साइबर सुरक्षा और डिजिटल साक्षरता जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। सामुदायिक संगठनों और महिला समूहों को तकनीकी एवं डिजिटल सहयोग उपलब्ध कराकर उन्हें आधुनिक संसाधनों से जोड़ने का प्रयास भी किया जा रहा है।
संघर्ष को बनाया समाज सेवा की ताकत
सुखनंदन दास की कहानी इस बात का उदाहरण है कि सच्चा नेतृत्व सुविधाओं से नहीं, बल्कि संघर्ष और संवेदनशीलता से पैदा होता है। जिन परिस्थितियों में कोई व्यक्ति अपने भविष्य को लेकर निराश हो सकता था, उन्हीं परिस्थितियों ने सुखनंदन को समाज के लिए काम करने की प्रेरणा दी।
उन्होंने व्यक्तिगत दुख और अभाव को अपनी कमजोरी बनने देने के बजाय उसे समाज की ताकत में बदल दिया। आज शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और युवा विकास के क्षेत्र में उनके प्रयास अनेक लोगों के लिए प्रेरणा बन रहे हैं।
उनकी जीवन यात्रा यह संदेश देती है कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, दृढ़ इच्छाशक्ति, सकारात्मक सोच और सेवा का भाव व्यक्ति को न केवल अपनी जिंदगी बदलने की शक्ति देता है, बल्कि वह समाज में भी सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है।
“अगर आप लोगों की सेवा करेंगे, तो ईश्वर किसी न किसी रूप में आपकी मदद अवश्य करेगा।” सुखनंदन दास के लिए यह केवल एक विचार नहीं, बल्कि उनके जीवन का सार है। संघर्ष से सेवा तक की उनकी यात्रा इसी विश्वास की जीवंत मिसाल है।



