नई दिल्ली। ₹2,000 से अधिक के कमर्शियल UPI लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाए जाने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। केंद्र सरकार की ओर से UPI भुगतान पर शुल्क से जुड़ी व्यवस्था को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई है। यह याचिका एडवोकेट अंजन दत्ता की ओर से दाखिल की गई है।
याचिका में केंद्र सरकार के साथ-साथ भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) और UPI से संबंधित प्रावधानों को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता ने सरकार की ओर से 14 दिसंबर को जारी अधिसूचना और 15 सितंबर को जारी MDR फ्रेमवर्क को रद्द करने की मांग की है।
क्या है पूरा मामला?
याचिका में ₹2,000 से अधिक के कमर्शियल UPI लेनदेन पर MDR लगाए जाने की व्यवस्था पर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि इस तरह का शुल्क लागू करने के लिए पर्याप्त कानूनी आधार होना जरूरी है। याचिका में इस व्यवस्था को मनमाना और भेदभावपूर्ण बताते हुए दावा किया गया है कि इसका असर देशभर के कारोबारियों पर पड़ेगा।याचिकाकर्ता के मुताबिक, UPI के जरिए होने वाले डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने और छोटे-बड़े कारोबारियों के बीच इसे व्यापक रूप से अपनाए जाने के बाद अब शुल्क लगाने की व्यवस्था से व्यापारियों पर अतिरिक्त आर्थिक भार पड़ सकता है।
आम उपभोक्ताओं पर भी पड़ सकता है असर
याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि भले ही प्रस्तावित शुल्क को मामूली बताया जाए या UPI के बुनियादी ढांचे और संचालन को बनाए रखने के लिए जरूरी बताया जाए, लेकिन इसका अप्रत्यक्ष असर आम लोगों पर भी पड़ सकता है।यदि MDR का भार कारोबारियों पर पड़ता है, तो इसकी भरपाई के लिए कुछ व्यापारी वस्तुओं या सेवाओं की कीमतों में बदलाव कर सकते हैं। हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव शुल्क की अंतिम संरचना और उसके लागू होने के तरीके पर निर्भर करेगा।विपक्ष ने भी सरकार को घेरा
UPI पर शुल्क लगाने के मुद्दे को लेकर विपक्षी दलों की ओर से भी सरकार पर सवाल उठाए गए हैं। लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने UPI पर लगाए जाने वाले कथित टैक्स को वापस लेने की मांग की है।वहीं, कांग्रेस नेता कार्ति चिदंबरम ने ₹2,000 से अधिक के मर्चेंट लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत MDR लगाए जाने के मुद्दे पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह ऐसा शुल्क है, जो भविष्य में बढ़ सकता है।



