कोरबा। अखिल भारतीय साहित्य परिषद न्यास के तत्वावधान में लोक साहित्य पर आधारित प्राक् लोकमंथन-2026 का भव्य आयोजन हुआ। कार्यक्रम का आयोजन 1 नवम्बर रविवार को बुधवारी बाईपास रोड, स्थित विवेकानंद सेवा सदन में प्रातः 11 बजे से प्रारंभ हुआ। कार्यक्रम का शुभारम्भ भारत माता के प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित एवं वंदना कर किया गया। अतिथियों का स्वागत शाल, प्रतीक चिन्ह से किया गया।
इसके उपरांत अखिल भारतीय साहित्य परिषद द्वारा आयोजित राष्ट्रीय स्तर का लोकमंथन-2026 आगामी 4 से 6 दिसंबर 2026 को जयपुर, राजस्थान में आयोजित होना प्रस्तावित है। इस आयोजन की पृष्ठभूमि तैयार करने तथा लोक साहित्य, लोक संस्कृति और भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध पक्षों पर व्यापक जनजागरण विकसित करने के उद्देश्य से देशभर में प्राक् लोकमंथन-2026 के कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में कोरबा में यह महत्वपूर्ण साहित्यिक एवं सांस्कृतिक आयोजन किया गया।
इस आयोजन के संबंध में जानकारी देते हुए अखिल भारतीय साहित्य परिषद के लोक साहित्य आयाम के अखिल भारतीय टोली सदस्य डॉ. देवदास साकेत ने बताया कि प्राक् लोकमंथन का प्रमुख उद्देश्य भारतीय लोकजीवन में रची-बसी साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विरासत को पहचानना, उसका संरक्षण करना तथा नई पीढ़ी तक पहुंचाना है। लोक साहित्य हमारी सामूहिक स्मृतियों, अनुभवों, परंपराओं, जीवन मूल्यों और सांस्कृतिक चेतना का जीवंत दस्तावेज है। लोकगीत, लोककथाएं, लोकोक्तियां, मुहावरे, लोकनाट्य और क्षेत्रीय बोलियां भारतीय समाज की आत्मा को अभिव्यक्त करते हैं।
उन्होंने कहा कि ‘हम भारत के लोग’ विषय भारतीय समाज की सामूहिक चेतना, विविधता में एकता और राष्ट्रीय एकात्मकता का महत्वपूर्ण संदेश देता है। भारत की सांस्कृतिक पहचान केवल लिखित साहित्य तक सीमित नहीं है, भारत की परंपरा आज भी गाँव में विद्यमान हैं, बल्कि गांवों, के अंचलों, लोक परंपराओं और जनमानस की वाणी में सुरक्षित लोक साहित्य में भी भारतीयता का व्यापक स्वरूप दिखाई देता है। लोक साहित्य भारतीय ज्ञान परंपरा को समझने और वर्तमान समय की आवश्यकताओं के अनुरूप नई दृष्टि विकसित करने का सशक्त माध्यम है। लोक साहित्य के सृजन और संवर्धन करने की आवश्यकता हैं। विशेष रूप से क्षेत्रीय बोलियों में उपलब्ध लोकगीतों, लोककथाओं, लघुकथाओं, लोकनाट्यों और मौखिक परंपराओं को लेखन एवं अभिलेखन के माध्यम से संरक्षित करने पर बल दिया जाएगा।
लोकभाषाओं और बोलियों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती आ रही सांस्कृतिक धरोहर आज संरक्षण की अपेक्षा रखती है। यदि इन लोक अभिव्यक्तियों को व्यवस्थित रूप से संकलित, प्रकाशित और प्रचारित किया जाए तो भारतीय समाज की सांस्कृतिक विविधता को नई पहचान मिल सकती है। साथ ही स्थानीय साहित्यकारों एवं नवोदित रचनाकारों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का अवसर भी प्राप्त होगा।
डॉ. साकेत ने कहा कि लोक साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज को संस्कार, नैतिकता, सामाजिक समरसता, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और राष्ट्रीय एकात्मता का संदेश देने वाली महत्वपूर्ण विधा है। भारतीय दर्शन की विशेषता यह है कि वह जीवन को खंडों में नहीं, बल्कि समग्रता में देखता है। यहां व्यक्ति और समाज, मनुष्य और प्रकृति, राष्ट्र और विश्व तथा जीव और जगत के बीच परस्पर संबंधों की कल्पना की गई है। इसी समग्र दृष्टि का सार है— लोक से राष्ट्र, राष्ट्र से विश्व और विश्व से समस्त सृष्टि के कल्याण की भावना। यह केवल एक चिंतन का उद्घोष नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की प्राचीन कालजयी जीवन पद्धति, सांस्कृतिक व्यवहार और आध्यात्मिक चेतना का मूल आधार है। लोक भारतीय सभ्यता की आत्मा और ज्ञान का आधार हैं। भारतीय दर्शन की दृष्टि में ‘लोक’ का अर्थ केवल जनसमूह या सामान्य समाज नहीं है। लोक में व्याप्त ऋत् व्यवस्था हैं जो जनजीवन, जनमानस, लोकपरंपरा, लोकभाषा, लोकसंस्कृति, लोकानुभव सामूहिक स्मृतियों का व्यापक संसार समाहित है। लोक वह स्थान है जहां जीवन अपनी सहजता में अभिव्यक्त होता है। कृषक के खेत में गूंजता हुआ गीत, मां की लोरी, विवाह के मंगलगीत, ऋतुओं के उत्सव, पर्वों की परंपराएं, समाज के प्रकृति गीत, लोककथाओं के नायक और बुजुर्गों की वाणी में सुरक्षित अनुभव—ये सभी भारतीय लोकजीवन के अभिन्न अंग हैं। लोक से विश्वकल्याण तक भारतीय चेतना का सांस्कृतिक संकल्प लोक साहित्य हमारी सांस्कृतिक स्मृति है, राष्ट्र हमारी सामूहिक पहचान है, विश्व हमारी व्यापक आत्मीयता का क्षेत्र है और समस्त सृष्टि का उद्घोष हमारे उत्तरदायित्व का विस्तार है। भारतीय विश्वदृष्टि हमें यह बोध कराती है कि व्यक्ति का जीवन केवल स्वयं के लिए नहीं, बल्कि दूसरों के सुख की अनुभूति में हैं, समाज की समरसता, राष्ट्र की उन्नति और संपूर्ण सृष्टि के संतुलन के लिए भी है। लोक साहित्य किसी एक लेखक या एक विशेष कालखंड की थाती नहीं होता। यह पीढ़ियों के कला, कौशल के अनुभवों से निर्मित सामूहिक ज्ञान है। इसमें समाज का इतिहास, संघर्ष, आनंद, आस्था, नैतिकता और जीवन व्यवहार की अविस्मरणीय चेतना का परिणाम है। लोकगीत केवल मनोरंजन नहीं करते, वे जीवन की संवेदनाओं को व्यक्त करते हैं। लोककथाएं केवल घटनाओं का वर्णन नहीं करतीं, बल्कि उनमें जीवन के मूल्य, विवेक और व्यवहार की शिक्षा भी निहित होती है। लोकोक्तियां सामान्य जन के दीर्घकालीन अनुभवों का महत्वपूर्ण ज्ञान हैं। जन-जन की वाणी से निकली लोक अभिव्यक्तियों का संरक्षण और संवर्धन भारतीय साहित्य एवं संस्कृति को समृद्ध बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। साहित्यकारों, लोक कलाकारों, शिक्षाविदों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों, युवाओं और साहित्य प्रेमियों से इस आयोजन में सहभागिता करने का आह्वान किया। श्रीमान योगेश्वर साहू, विभाग प्रचारक, कोरबा ने अपने उद्बोधन में कहा कि हम सभी का दायित्व है कि अपनी क्षेत्रीय भाषा, बोली, लोकगीत, लोककथा और सांस्कृतिक परंपराओं को लेखन एवं सृजन के माध्यम से आगे बढ़ाएं, ताकि भारतीय ज्ञान परंपरा की समृद्ध विरासत आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंच सके। लोक से राष्ट्र, राष्ट्र से विश्व और विश्व से समस्त सृष्टि के कल्याण की भावना ही भारतीय विश्वदृष्टि का मूल स्वर है। भारतीय चिंतन में लोकमंगल, सांस्कृतिक एकात्मता, सह-अस्तित्व और वसुधैव कुटुम्बकम् का विराट दर्शन भारत की विश्वदृष्टि को समझने के लिए भारत के लोकजीवन, उसकी सांस्कृतिक चेतना, ज्ञान परंपरा और जीवन दर्शन को समझना आवश्यक है।
मुख्य अतिथि श्रीमान गेंदलाल शुक्ला ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारत केवल एक भौगोलिक इकाई या राजनीतिक व्यवस्था का नाम नहीं है, बल्कि यह हजारों वर्षों से विकसित होती हुई भारतीय सभ्यता, संस्कृति, ज्ञान, अनुभव, संवेदना और सामूहिक जीवन मूल्यों की विराट अभिव्यक्ति है। भारत का चिंतन व्यक्ति से प्रारंभ होकर परिवार, समाज, लोक, राष्ट्र, मानवता और अंततः समस्त चराचर सृष्टि के कल्याण तक विस्तृत होता है। इसलिए लोक साहित्य को भारतीय ज्ञान परंपरा का जीवंत और गतिशील स्वरूप कहा जा सकता है।
विशिष्ट अतिथि प्रो. भूपेंद्र कुमार पटेल ने अपने उद्बोधन में कहा कि लोक से राष्ट्र सांस्कृतिक एकात्मता का विकास भारत की राष्ट्रीय चेतना को समझने के लिए उसकी विविधतापूर्ण लोक परंपराओं को समझना जरूरी है। भारत में अनेक भाषाएं, बोलियां, वेशभूषाएं, खानपान, रीति-रिवाज और भौगोलिक परिस्थितियां हैं, फिर भी इनके भीतर एक साझा सांस्कृतिक चेतना प्रवाहित होती है। लोकजीवन की अभिव्यक्तियां अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन उनमें जीवन के मूल भावों में गहरा साम्य दिखाई देता है। मातृशक्ति के प्रति सम्मान, अतिथि सत्कार, प्रकृति के प्रति श्रद्धा, परिवार की आत्मीयता, सामूहिकता, करुणा, परोपकार और लोकमंगल की भावना पूरे भारत में विभिन्न रूपों में प्रकट होती रही है। भारत की एकात्मता का आधार एकरूपता नहीं, बल्कि विविधताओं के बीच अंतर्निहित आत्मीय संबंध रहा है।
लोक साहित्य इस सांस्कृतिक एकात्मता का महत्वपूर्ण वाहक है। अलग-अलग क्षेत्रों के लोकगीत और लोकगाथाएं अपनी स्थानीय पहचान बनाए रखते हुए राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना को समृद्ध करती हैं।
इस दृष्टि से ‘हम भारत के लोग’ भारत के सामूहिक सांस्कृतिक अस्तित्व को समझने का भी एक अवसर है। भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि में यही सामूहिकता लोकजीवन की विविध परंपराओं से भी शक्ति प्राप्त करती है।
लोकजीवन, लोकगीतों, लोकनृत्यों की अपनी ज्ञान परंपरा है। पंडवानी, भरथरी, ददरिया, करमा, सुआ गीत, पंथी, राउत नाचा और अनेक क्षेत्रीय लोककलाएं यहां के सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन की महत्वपूर्ण अभिव्यक्तियां हैं।
छत्तीसगढ़ में प्रकृति के साथ संबंध, सामुदायिक जीवन, सामूहिक श्रम, पर्व-उत्सव और मौलिक परंपराओं का विशेष महत्व है। इन परंपराओं में मानव और प्रकृति के बीच आत्मीय संबंधों के अनेक उदाहरण मिलते हैं।
इस कार्यक्रम संयोजक एवं संचालन अरुण दास वैष्णव ने किया। इस अवसर पर कोरबा के लोक गीत कलाकार एवं अशोक तिवारी, मृगेश यादव, डॉ. पापिया चतुर्वेदी, जितेंद्र साहू, कार्यक्रम की योजना से जुड़े कैलाश नाहक, रामकिशोर श्रीवास्तव, उत्तम कुमार पाठक, अखिलेशमणि तिवारी, रामकिशोर श्रीवास्तव, राजेंद्र प्रसाद पाण्डेय, चन्द्र किशोर श्रीवास्तव, भानू साहू , मुकेश कुमार चतुर्वेदी, दिलीप चतुर्वेदी, यज्ञ नारायण यादव, संतोष यादव, रजनी चौहान, कृष्ण कुमार चंद्र, मुकेश अग्रवाल, अशोक पाल कविता जैन, पंकज कुमार जैन, कौशिल्य खुराना, पंचमदास महंत, देवीलाल यादव, साधना, लक्ष्मी नारायण, राम उदय, रमेश सिंह, सुनीता साहू, रवि सारथी, राजेंद्र अदिल, सत्यनारायण मनहर, शिवचरण साहू,भानु प्रसाद साहू, उमाशंकर तिवारी, निर्मल राय, संतोष यादव, सत्य नारायण यादव, लखन लाल चंद्र और अन्य सहयोगियों एवं मिडिया से पधारे गोविन्द तिवारी एवं साथी की उपस्थिति उल्लेखनीय रही।




