बलौदाबाजार। जिले के प्राचीन एवं ऐतिहासिक ग्राम डमरू को पुरातात्विक पहचान दिलाने और यहां मौजूद ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण की दिशा में जिला प्रशासन ने पहल तेज कर दी है। कलेक्टर कुलदीप शर्मा ने शनिवार को ग्राम डमरू पहुंचकर प्राचीन मंदिरों, पुरातात्विक स्थलों और वहां सुरक्षित अवशेषों का निरीक्षण किया। उन्होंने अधिकारियों को पुरातात्विक अवशेषों के व्यवस्थित संरक्षण के लिए प्रस्ताव तैयार कर भेजने तथा पूर्व में किए गए उत्खनन कार्य को दोबारा शुरू कराने के लिए आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए।
प्राचीन शिव और महामाया मंदिर में की पूजा-अर्चना
कलेक्टर कुलदीप शर्मा ने डमरू पहुंचने के बाद सबसे पहले प्राचीन शिव मंदिर और महामाया मंदिर में दर्शन कर पूजा-अर्चना की। इसके बाद उन्होंने मंदिर परिसर में मौजूद प्राचीन शिलाओं और पुरातत्व विभाग द्वारा सुरक्षित रखे गए पुरातात्विक अवशेषों का बारीकी से निरीक्षण किया। उन्होंने अधिकारियों से अवशेषों की स्थिति और उनके संरक्षण की जानकारी ली तथा ऐतिहासिक धरोहरों को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक प्रस्ताव शासन को भेजने के निर्देश दिए।
उत्खनन कार्य फिर शुरू कराने के निर्देश
निरीक्षण के दौरान कलेक्टर ने मंदिर के समीप छत्तीसगढ़ संस्कृति एवं पुरातत्व संचालनालय द्वारा पूर्व में उत्खनित किए गए दो टीलों का भी जायजा लिया। उन्होंने डमरू की पुरातात्विक महत्ता को देखते हुए इन स्थलों पर उत्खनन कार्य पुनः शुरू कराने की आवश्यकता जताई। इसके लिए संबंधित विभाग से समन्वय कर आवश्यक प्रस्ताव और कार्रवाई करने के निर्देश अधिकारियों को दिए।
ग्रामीणों की मांग पर सड़क निर्माण की तत्काल स्वीकृति
कलेक्टर ने ग्रामीणों से भी सीधे संवाद कर गांव की समस्याओं और आवश्यकताओं की जानकारी ली। इस दौरान ग्रामीणों ने शिव मंदिर से मुख्य मुक्तिधाम तक पक्की सड़क नहीं होने की समस्या बताई और सड़क निर्माण की मांग रखी। ग्रामीणों की मांग को गंभीरता से लेते हुए कलेक्टर ने मौके पर ही सड़क निर्माण की तत्काल स्वीकृति दी। उन्होंने संबंधित अधिकारियों को सड़क निर्माण का प्राक्कलन शीघ्र तैयार करने के निर्देश दिए।
इसके अलावा कलेक्टर ने गांव के मुख्य मुक्तिधाम में निर्माणाधीन शेड का भी निरीक्षण किया। उन्होंने निर्माण कार्य की प्रगति की जानकारी लेते हुए निर्धारित समय-सीमा में गुणवत्तापूर्ण कार्य पूरा कराने के निर्देश दिए।
बुद्ध के चरण चिह्न मिलने से बढ़ी डमरू की ऐतिहासिक महत्ता
जिला मुख्यालय बलौदाबाजार से करीब 14 किलोमीटर दूर शिवनाथ नदी के तट पर स्थित डमरू ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है। छत्तीसगढ़ संस्कृति एवं पुरातत्व संचालनालय ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की अनुमति से डॉ. शिवकांत बाजपेयी के निर्देशन में वर्ष 2013 से 2015 के बीच यहां दो टीलों का उत्खनन कराया था।
उत्खनन के दौरान भगवान बुद्ध के चरण चिह्न मिलने की जानकारी सामने आई थी। इसे मध्य भारत में प्राप्त महत्वपूर्ण पुरातात्विक प्रमाणों में गिना जाता है। इन अवशेषों के आधार पर डमरू के पहली से पांचवीं शताब्दी के बीच हीनयान बौद्ध समुदाय के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित होने की संभावना जताई गई है।
कलचुरीकालीन मंदिर और महत्वपूर्ण प्रतिमाएं
महामाया मंदिर परिसर में प्रस्तर निर्मित चबूतरे पर प्राचीन शिव मंदिर स्थित है। पूर्वाभिमुख यह मंदिर लंबे समय तक जर्जर स्थिति में रहा, जिसके संरक्षण के लिए वर्ष 2012-13 में पुरातत्व विभाग द्वारा रिसेटिंग का कार्य कराया गया था। मंदिर परिसर में दो छोटे टीले भी मौजूद हैं।
पूर्व में किए गए उत्खनन से त्रिविक्रम, विष्णु, सूर्य, शिव, ब्रह्मा, मय, चामुंडा, पार्वती, अंबिका और चंवरधारिणी सहित कई महत्वपूर्ण प्रतिमाएं तथा मिथुन प्रतिमाएं प्राप्त हुई थीं। इनमें से कई प्रतिमाओं को शिव मंदिर परिसर में नवनिर्मित महामाया देवी मंदिर की दीवारों में स्थापित किया गया है।
पुरातत्व विभाग के अनुसार, प्राचीन शिव मंदिर कलचुरीकालीन स्थापत्य का महत्वपूर्ण उदाहरण है, जिसका काल लगभग 12वीं शताब्दी ईस्वी माना जाता है। यहां प्राप्त प्रतिमाएं और स्थापत्य अवशेष डमरू की ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक महत्ता को रेखांकित करते हैं। कलेक्टर के निरीक्षण और संरक्षण संबंधी निर्देशों से इस प्राचीन धरोहर के संरक्षण एवं विकास की दिशा में नई पहल की उम्मीद जगी है।



