गुरुर। बालोद जिले के नगर पंचायत गुरुर में जमीन की खरीदी-बिक्री से जुड़ा एक बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आ रहा है। मुख्य मार्ग से लगी 416.35 वर्ग मीटर की बेशकीमती जमीन, खसरा नंबर 640, जो वास्तविक रूप से वार्ड क्रमांक-4 में बताई जा रही है, उसे दस्तावेजों में महात्मा गांधी वार्ड क्रमांक-3, बाजार चौक दर्शाकर बेच दिया गया। मामला पटवारी हल्का नंबर-21 का है। खरीदी-बिक्री का पूरी पटकथा फर्जी नाम से शुरू हुआ है।
राजस्व विभाग और पंजीयन के दस्तावेजों से पता चला है कि वार्ड क्रमांक-4 की जमीन को वार्ड क्रमांक-3 बनाकर बेच दिया गया है। पंजीयन कार्यालय में दस्तावेजों की जांच महज खानापूर्ति तरीके से की गई या फिर सब कुछ जानते हुए भी दस्तावेज आगे बढ़ा दिए गए? मामला सीधा है, राजस्व कर्मियों ने लेन-देन कर इस गड़बड़ी को अंजाम देने में साथ दिया। रोड-रास्ता को लेकर हुए विवाद के बाद अब यह मामला खुल रहा है। शिकायतकर्ता राकेश अटल ने इस मामले को आयुक्त कार्यालय तक पहुंचा दिया है। उन्होंने बताया कि इस मामले में राजस्व पंजीयन और जमीन खरीदने वाले ने शासन को चूना लगाया है। वहीं स्थानीय स्तर पर सवाल भी उठ रहा है कि क्या रुपये लेन-देन के बाद पंजीयन कार्यालय और राजस्व कर्मियों ने यह काम कराया गया?
सवालों के घेरे में नगर पंचायत की एनओसी
मामला यहीं खत्म नहीं होता। वर्ष 2018 में जमीन की खरीदी-बिक्री होने की बात सामने आ रही है, लेकिन बताया गया है कि आज तक जमीन का नामांतरण नहीं हुआ। इसके बावजूद नगर पंचायत द्वारा भवन अनुज्ञा पत्र/एनओसी जारी किए जाने की बात सामने आई है। ऐसे में सवाल सीधा है, जब जमीन का नाम ही खरीदार के नाम दर्ज नहीं हुआ था, तो भवन निर्माण की अनुमति किस आधार पर दे दी गई? क्या नगर पंचायत में भी दस्तावेजों की जांच नहीं हुई? या फिर रुपये लेकर एनओसी जारी करने का खेल हुआ? अब संबंधित अधिकारी यह स्पष्ट करेंगे कि एनओसी जारी करने से पहले किन-किन रिकॉर्ड की जांच की गई थी।
जमीन पर मकान था, फिर कागजों में क्या दिखाया गया?
आरोप है कि जिस जमीन की बिक्री हुई, उस पर पहले से मकान बना हुआ था। इसके बावजूद दस्तावेजों में जमीन की स्थिति को लेकर अलग जानकारी दर्ज किए जाने की बात सामने आ रही है। यदि मौके पर मकान मौजूद था और रिकॉर्ड में उसे नहीं दर्शाया गया, तो यह भी जांच का महत्वपूर्ण बिंदु है।
हर वार्ड का सरकारी मूल्य अलग, राजस्व का भारी नुकसान
सबसे गंभीर पहलू सरकारी राजस्व से जुड़ा है। वार्ड क्रमांक-3 और वार्ड क्रमांक-4 में जमीन के सरकारी मूल्य अलग-अलग हैं। ऐसे में यदि वार्ड-4 की जमीन को वार्ड-3 बताकर पंजीयन कराया गया, तो स्टांप ड्यूटी और पंजीयन शुल्क की गणना पर सीधा असर पड़ सकता है। इस कथित खेल के कारण राज्य शासन को लाखों रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ। वर्ष 2018 की गाइडलाइन दर, पंजीयन दस्तावेज, स्टांप ड्यूटी, वास्तविक लोकेशन और खसरा रिकॉर्ड की जांच कर वास्तविक नुकसान का हिसाब निकाला जाए तो सरकार को बड़ा राजस्व मिलेगा।
आधार कार्ड से लेकर नामांतरण तक कई सवाल
खरीदारों के दस्तावेजों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। दावा है कि खरीददार का आधार कार्ड उपलब्ध नहीं था, फिर भी जमीन की खरीदी-बिक्री हो गई। इसकी भी पंजीयन रिकॉर्ड से जांच जरूरी है। जमीन विक्रेता यशवंत आनाराम तथा खरीदार राकेश कुमार देवांगन पिता भूखा राम देवांगन और केशव राम देवांगन पिता पोषण लाल देवांगन बताए गए हैं। अब जांच के सामने सवालों की लंबी फेहरिस्त है—वार्ड बदला किसने? जमीन का मूल्यांकन कैसे हुआ? नामांतरण के बिना एनओसी कैसे मिली? और यदि सरकारी राजस्व में हेराफेरी हुई तो उसका लाभ किसे मिला? यह मामला केवल एक जमीन की बिक्री का नहीं, बल्कि राजस्व रिकॉर्ड, पंजीयन प्रक्रिया और नगर पंचायत की कार्यप्रणाली की पारदर्शिता पर बड़ा सवाल है। निष्पक्ष जांच में इस कथित खेल के पीछे कई स्तरों पर मिलीभगत सामने आएगी।
वर्जन
स्टांप ड्यूटी की चोरी एक गंभीर अपराध है। ऐसा पाया जाता है तो जमीन विक्रेता और खरीदार दोनों दोषी है। गलत दस्तावेज तैयार करने वाले राजस्व कर्मियों के साथ सभी पर अपराध दर्ज हो सकता है। शिकायत मिलने पर स्टांप ड्यूटी की वसूली की जाएगी। जिला पंजीयक को पत्र भेजा जाएगा। मामले के निराकरण तक संबंधित जमीन की खरीदी -बिक्री नहीं हो सकती, क्योंकि यह मामला न्यायालय में चला जाता है। -शशि पात्रे, रजिस्ट्रार, गुरुर, जिला बालोद



