शान्ति सरोवर सड्ढू में सजाई मई मनमोहक झाँकी

शान्ति सरोवर सड्ढू में सजाई मई मनमोहक झाँकी

रायपुर । प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय द्वारा जन्माष्टमी के अवसर पर विधानसभा मार्ग पर शान्ति सरोवर रिट्रीट सेन्टर में बहुत ही आकर्षक झाँकी सजाई गई है। जिसमें इस संस्थान के  बाल कालाकारों द्वारा महारास और श्रीकृष्ण का तुलादान नामक नृत्य नाटक की प्रस्तुति मन को मोह लेती है। यह झाँकी सोमवार को शाम पांच बजे […]

रायपुर । प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय द्वारा जन्माष्टमी के अवसर पर विधानसभा मार्ग पर शान्ति सरोवर रिट्रीट सेन्टर में बहुत ही आकर्षक झाँकी सजाई गई है। जिसमें इस संस्थान के  बाल कालाकारों द्वारा महारास और श्रीकृष्ण का तुलादान नामक नृत्य नाटक की प्रस्तुति मन को मोह लेती है। यह झाँकी सोमवार को शाम पांच बजे से रात के दस बजे तक अवलोकनार्थ खुली रहेगी।

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इस अवसर पर रायपुर संचालिका ब्रह्माकुमारी सविता दीदी ने कहा कि श्रीकृष्ण जयन्ती पर यही ईश्वरीय सन्देश है कि श्रीकृष्ण के दैवी गुणों और विशेषताओं को जीवन में उतारने का प्रयास किया जावे। गीता में बतलाए अनुसार अपने अन्दर छिपे हुए शत्रुओं काम, क्रोधादि विकारों का नाश करने से ही छोटी-मोटी बातों के लिए जो घर-घर में महाभारत चल रहा है, उसे समाप्त कर सकेंगे। ब्रह्माकुमारी सविता दीदी ने आगे कहा कि विज्ञान के इस युग में श्रीकृष्ण की जयन्ती मना लेना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उनके द्वारा किए गए महान कार्यों के बारे में गहन चिन्तन कर उसे जीवन में उतारने की जरूरत है।उन्होंने बतलाया कि अर्जुन का अर्र्थ होता है ज्ञान अर्जन करने वाला। श्रीकृष्ण जयन्ती और गीता की सार्थकता इसी में है कि हरेक मनुष्य अर्जुन बने और गीता का अच्छी तरह से विवेचन कर उसे आत्मसात करने का प्रयास करे। कोई भी मनुष्य किसी का शत्रु नहीं होता है। इसका स्पष्ट उल्लेख श्रीमद भगवद् गीता में मिलता है जिसमें लिखा है कि हे अर्जुन मनुष्य के अन्दर व्याप्त काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार ही उसके शत्रु हैं। जब हम इन विकारों पर विजय प्राप्त कर लेंगे तभी हम सुख और शान्ति से रह सकेंगे। गीता के माध्यम से समाज को यह सन्देश दिया गया है कि परमात्मा के साथ प्रीत बुद्घि होकर रहो क्योंकि इससे ही परिस्थितियों पर विजय प्राप्त करने में परमात्मा की मदद मिल सकेगी।उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण का तुला दान नाटक में यही दर्शाया गया है कि सत्यभामा ने कृष्ण को माया और शक्ति के माध्यम से प्राप्त करना चाहा किन्तु पा न सकी। वहीं दूसरी ओर रूक्मणी ने सच्ची प्रीत से प्रभु को पा लिया।

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